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INDIA
अरे मोची! तुम अब भी यहीं बैठे हो? राजनीति के शोर से दूर, रोजी-रोटी का मौन संघर्ष

भोजराज के सामने बैठे-बैठे मुझे अपना बचपन याद आ गया. तब टूटी चीजें फेंकी नहीं जाती थीं. घर में चप्पल टूटती तो मोची के पास जाती. कपड़ा फटता तो सिल दिया जाता. सामान पुराना होता तो उसकी मरम्मत होती.
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